समस्त भक्तजनों को ज्ञात हो, कि श्री हनुमान बालाजी मंदिर में श्री प्रभु के चरणों में चलित प्रसाद सेवा व्यवस्था की सभी भक्तों ने प्रशंसा की है। श्री हनुमान बालाजी मंदिर प्रबंध समिति ने इस व्यवस्था को लागू करने में निम्नलिखित महत्वपूर्ण विचारों को ध्यान में रखा।

1. हिन्दू संस्कृति में मंदिर में प्रसाद लगाने की महानता के अन्तर्गत प्रत्येक भक्त अपनी सामर्थ व इच्छानुसार मंदिर के भंडार में योगदान करता है जिससे उसकी प्रसाद सेवा का लाभ समस्त भक्तों को प्राप्त हो तथा उस प्रसाद में से वह भी अपनी जरूरत के भाग को ग्रहण करता है।

2. मंदिर में आने का लक्ष्य प्रसाद चढ़ाना कदापि नहीं था और न ही होना चाहिये। मंदिर में आकर भक्त श्री प्रभु के चरणों में अपनी भावनायें अर्पित करें और तत्पश्चात वितरित प्रसाद को ग्रहण करें। श्री प्रभु के दरबार में प्रसाद कोई मिष्ठान्न नहीं है पर वह एक अन्न क्षेत्र का स्वरूप है जिसमें प्रत्येक भक्त या अतिथि को अपना भाग, चाहे वह बहुत थोड़ा ही हो, ग्रहण करने का अधिकार होता है।

3. इस सामाजिक कार्य में हर भक्त का योगदान होता है। यह प्रसाद रूपी अन्न क्षेत्र प्रत्येक मंदिर व्यवस्था का एक अभिन्न अंग होता है। हिन्दू संस्कृति के अन्तर्गत कोई भी सामर्थ भक्त मंदिर में आर्थिक या किसी अन्य प्रकार के योगदान के बिना अन्न/प्रसाद ग्रहण नहीं करता है। अतएव इसी भाव को बनायें रखने की द्रष्टि से इसके लिए इसका कुछ सेवा मूल्य निश्चित किया गया है, जिससे यदि कोई भक्त प्रसाद की कुछ निश्चित मात्रा अपने परिवार या मित्रजनों के लिए घर ले जाना चाहता है तो वह उस को तदानुसार ले जा सकें। अन्यथा प्रसाद तो मंदिर में समस्त भक्तों को निशुल्क मिलता ही है।

4. प्राचीन काल में जब मंदिर व्यवस्था स्थापित हुई थी तब मंदिर एक सामाजिक पीठ होता था जहाँ से राजपाठ एवं समाज का निर्माण होता था। शिक्षा, राजनीति, सामाजिक व सुरक्षा नियम निर्धारित होते थे। प्रत्येक अतिथि की वहां पर रहने व सत्कार की व्यवस्था होती थी। समस्त सामाजिक सुख-दुख के कार्य वहां से सम्पन्न होते थे। प्रत्येक उत्सव व धार्मिक कार्य मंदिर परिसर में ही होते थे और प्रत्येक व्यक्ति श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार तन, मन एवं धन से सहयोग करता था। वहां पर वितरण होने वाले भंडारे को ही प्रसाद कहा जाता था। आज भी वही भाव प्रचलित होना चाहिये जिससे समाज एकजुट हो और उसका उत्थान हो।

5. उसी परिपाटी के चलते प्रत्येक भक्त अपनी सामर्थता के अनुसार मंदिर में प्रसाद सेवा आर्थिक रूप से करता है। और उस सेवा में मंदिर के समस्त भक्तों को प्रसाद मिलता है। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने की कोई महानता नहीं है, पर मंदिर से प्रसाद ग्रहण करने से है और उस प्रसाद व्यवस्था में यथा सामर्थ सहयोग करने में है।

6. इसके अतिरिक्त श्री प्रभु को भोग लगाने के लिए हम उनको अपने परिवार का मुख्य सदस्य मानते हैं। जैसे घर में किसी भी अतिथि या परिवार जन को भोजन एक अत्यन्त शांत वातावरण में सुंदर रूप एवं शुद्धता से परोसकर तुलसीदल, जल इत्यादि के साथ पर्दे में समर्पित किया जाता है, उसी प्रकार से मंदिर में श्री प्रभु की सेवा में भोजन को भोग के लिए समर्पित करना होता है और उसके बाद वह प्रसाद रूप हो जाता है और उस भोग को ही भक्त जन ग्रहण करते हैं। क्योंकि प्रत्येक भक्त के द्वारा भेंट किये हुए भोजन का विधिनुसार भोग नहीं लगाया जा सकता अतएव श्री प्रभु की सेवा में सामूहिक रूप से भोग लगाया जाता है और तद्धैव भोग प्रसाद की भक्तों में वितरण की व्यवस्था की जाती है और जो मंदिर में भी की गई है।

7. प्रसाद सेवा में ‘‘तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा’’ भावना प्रधान है। जब हम यह कहते हैं कि मैंने भगवान को प्रसाद चढ़ाया तो इसमें ‘मैं’ प्रधान हो गया और श्री प्रभु पाने वाले हो गये। पर जब हम यह कहते हैं कि मैंने प्रभु का प्रसाद पाया तब उसमें श्री प्रभु प्रधान होते हैं और भक्त उनकी कृपा का पात्र होता है। इसीलिए कभी भी प्रसाद चढ़ाने की परिभाषा विकसित नहीं की गई पर हमेशा प्रसाद को श्री प्रभु के दरबार से पाने का संदेश ही दिया गया और यह ही भाव प्रधान है।

8. इसके अतिरिक्त अगर जो हम अपने माता, पिता, बहन, भाई, पुत्री, पुत्र या किसी और संबंधी या मित्र को सुबह से शाम तक अन्न ग्रहण करने के लिए बाध्य करें तो कुछ समय बाद वह निश्चित रूप से अस्वस्थ हो जायेगें। यही रूप हमारे लिए श्री प्रभु का है। वह कोई निर्जीव वस्तु नहीं पर पूर्ण सजीव रूप में प्रकट है और यह रूप वही है जिसमें हम आप उनको देखते हैं। क्या आप को नहीं लगता कि हमारे भगवान सुबह से शाम तक हर भक्त का भोग भेंट ग्रहण करके अस्वस्थ हो सकते हैं। हिन्दू संस्कृति में हम श्री प्रभु के साथ वैसे ही आचरण करते हैं जैसा कि हम अपने किसी भी आत्मियजन के लिए सोचते है और श्री प्रभु से भी ऐसी ही अपेक्षा करते हैं कि वह हमेशा वैसा ही संरक्षण दे जैसा एक पिता अपने परिवार को प्रदान करता है। अतः हमारा हर आचरण एक सजीव भाव में होना चाहिये। इसी लिए प्रत्येक व्यक्ति पीठ मंदिर में श्री प्रभु की सेवा में भोग निश्चित समय पर ही अर्पित किया जाता है।

9. हम सब लोग यह भी जानते हैं कि मंदिर में पुजारीगण जिस प्रकार से आपके द्वारा अर्पित भोग को श्री प्रभु की सेवा में भेंट करते हैं वह पूर्णतयः निर्धारित विधि विधान के विपरित होता है क्योंकि उसको पालने/करने का वहां पर समय ही नहीं होता। इस प्रकार से भोग तो कोई अपने घर में किसी भी व्यक्ति को भेंट नहीं करता। केवल औपचारिकता को पूर्ण करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं होना चाहिये।

10. अगर आप भाव को समझे तो प्रायः मंदिरों में जितनी देर में आपका भोग श्री प्रभु को दिखाकर वापिस ले लिया जाता है उतनी देर में तो श्री प्रभु उसको देख भी नहीं पाते, ग्रहण करने का विचार तो क्या समझे।

” श्री हनुमान बाला जी महाराज की जय “